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Institutional Harassment: वह दबाव जो दिखाई नहीं देता, लेकिन जान ले लेता है

तन्वी, अमन, रोहित, पायल… नाम बदलते हैं, समस्या वही रहती है

Ravi Tondak by Ravi Tondak
April 5, 2026
in Court & Judgements, Crime News, Law Explained
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Institutional Harassment and Student Suicide
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“मैम, किस-किस को खुश करूँ?”

यह सिर्फ एक परेशान स्टूडेंट का सवाल नहीं है। यह आज के एजुकेशन सिस्टम, जॉब सिस्टम और कई प्रोफेशनल क्षेत्रों की एक कड़वी सच्चाई बनती जा रही है।

डॉ. तन्वी की मौत ने एक बार फिर हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे देश में आगे बढ़ने के लिए मेहनत और टैलेंट काफी है, या फिर सही लोगों को खुश रखना भी जरूरी हो गया है? अगर मीडिया रिपोर्ट्स और परिवार के आरोप सही हैं, तो यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की समस्या को दिखाता है।

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यह समस्या सिर्फ मेडिकल कॉलेज तक सीमित नहीं है

ऐसी समस्याएँ मेडिकल कॉलेज, लॉ फर्म, कॉरपोरेट जॉब, यूनिवर्सिटी, पीएचडी, ज्यूडिशियल इंटर्नशिप, मीडिया, मॉडलिंग और एक्टिंग जैसे कई क्षेत्रों में देखने को मिलती हैं।
जहाँ एक सीनियर या अधिकारी के हाथ में आपके नंबर, आपकी रिपोर्ट, आपकी सिफारिश (recommendation), आपका प्रमोशन या आपका सिलेक्शन होता है, वहाँ पावर का बैलेंस खत्म हो जाता है और दबाव शुरू हो जाता है।

यह सिर्फ जेंडर की समस्या नहीं है। यह सिर्फ एक प्रोफेशन की समस्या नहीं है।
यह पावर और अकाउंटेबिलिटी के असंतुलन की समस्या है। जहाँ पावर है लेकिन अकाउंटेबिलिटी नहीं है, वहाँ शोषण की संभावना बढ़ जाती है।

Mental Harassment को कानून में कैसे साबित किया जाता है?

ऐसे मामले पहले भी सामने आ चुके हैं

देश में पहले भी कई मामले सामने आए हैं जहाँ संस्थागत दबाव और उत्पीड़न की बात सामने आई:

  • डॉ. अमन कच्छरू – रैगिंग और प्रताड़ना का मामला
  • डॉ. पायल तड़वी – सीनियर्स द्वारा उत्पीड़न का मामला
  • रोहित वेमुला – संस्थागत भेदभाव और मानसिक दबाव का मामला
  • IIT और अन्य संस्थानों में कई स्टूडेंट सुसाइड मामले

इन सभी मामलों में एक बात कॉमन थी — Institutional Harassment (संस्थागत उत्पीड़न)।

मेंटल टॉर्चर दिखता नहीं है

अगर किसी को मारा जाए तो चोट दिखती है।
लेकिन अगर रोज अपमान किया जाए, बार-बार टारगेट किया जाए, करियर खराब करने की धमकी दी जाए, सबके सामने नीचा दिखाया जाए — तो इसका कोई निशान शरीर पर नहीं दिखता, लेकिन यह इंसान को अंदर से तोड़ देता है।

“Mental harassment leaves no visible scars, but it breaks a person from inside.”

स्टूडेंट या जूनियर शिकायत क्यों नहीं करता?

क्योंकि उसे पता है शिकायत करने का मतलब हो सकता है:

  • इंटरनल मार्क्स कटना
  • फेल होना
  • थीसिस रुकना
  • खराब रिपोर्ट लगना
  • सिफारिश (Recommendation) न मिलना
  • नौकरी/डिग्री खतरे में पड़ना

इसलिए ज्यादातर लोग चुप रहते हैं, सहते रहते हैं।

एक अधिवक्ता के रूप में काम करते हुए मैंने कई बार देखा है कि लोग मानसिक उत्पीड़न सहते रहते हैं, लेकिन लिखित शिकायत नहीं करते। बाद में जब मामला बहुत गंभीर हो जाता है, तब उनके पास सबूत नहीं होते। हमें यह समझना होगा कि कानून भावनाओं पर नहीं, सबूतों पर चलता है। इसलिए ऐसे मामलों में ईमेल, मैसेज, ऑडियो रिकॉर्डिंग, लिखित शिकायत और गवाह बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

कानून क्या कहता है? (Legal Awareness)

अगर किसी व्यक्ति को लगातार इस हद तक मानसिक रूप से परेशान किया जाए कि वह आत्महत्या जैसा कदम उठा ले, तो यह सिर्फ सुसाइड नहीं, कानून की नजर में आत्महत्या के लिए उकसाना (Abetment) भी माना जा सकता है।

कानूनी रूप से सिर्फ यह कहना काफी नहीं होता कि किसी ने मानसिक रूप से परेशान किया। अदालत यह देखती है कि क्या लगातार उत्पीड़न हुआ, क्या धमकी दी गई, क्या पावर का गलत इस्तेमाल हुआ, और क्या उस उत्पीड़न और आत्महत्या के बीच सीधा संबंध था। अगर यह साबित हो जाए कि लगातार मानसिक दबाव और उत्पीड़न के कारण व्यक्ति को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा, तो यह आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment) का मामला बन सकता है।

कानून में रैगिंग, यौन उत्पीड़न और भेदभाव के खिलाफ नियम हैं, लेकिन Academic या Institutional Harassment के लिए स्पष्ट और मजबूत कानून अभी भी नहीं है, और यही सबसे बड़ी कमी है।

हमारे संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। अगर किसी व्यक्ति को उसके कार्यस्थल या शैक्षणिक संस्थान में इस हद तक मानसिक रूप से परेशान किया जाए कि उसका मानसिक संतुलन और गरिमा प्रभावित हो, तो यह केवल एक प्रशासनिक या अनुशासनात्मक मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों से भी जुड़ जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल के वर्षों में छात्र आत्महत्या और संस्थागत दबाव को गंभीर समस्या माना है और संस्थानों को मेंटल हेल्थ सपोर्ट सिस्टम बनाने और छात्रों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी बहुत कमी है।

संस्थागत जिम्मेदारी (Institutional Liability)

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण कानूनी सवाल यह भी है कि क्या सिर्फ एक व्यक्ति जिम्मेदार होता है, या संस्था (Institution) की भी जिम्मेदारी बनती है? अगर किसी संस्था को बार-बार शिकायत दी जाए और वह कोई कार्रवाई न करे, तो यह संस्थागत लापरवाही (Institutional Negligence) का मामला भी बन सकता है। आने वाले समय में अदालतों को इस विषय पर और स्पष्ट दिशा-निर्देश देने की जरूरत है, ताकि संस्थाओं की जिम्मेदारी भी तय हो सके।

समाधान क्या हो सकता है?

अगर सच में ऐसी घटनाओं को रोकना है, तो सिस्टम में बदलाव करना होगा:

  • इंटरनल मार्क्स एक व्यक्ति के हाथ में नहीं होने चाहिए
  • अनॉनिमस (गुप्त) शिकायत सिस्टम होना चाहिए
  • हर कॉलेज और संस्थान में इंडिपेंडेंट मेंटल हेल्थ सेल होना चाहिए
  • एक ही गाइड या HOD के पास पूरी पावर नहीं होनी चाहिए
  • Viva और इंटरनल असेसमेंट में पारदर्शिता होनी चाहिए
  • संस्थान (Institution) को भी जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए
  • शिकायत करने वाले स्टूडेंट/जूनियर को सुरक्षा मिलनी चाहिए

सबसे जरूरी बात

बच्चे घर पर नहीं बैठ सकते। उन्हें पढ़ना है, काम करना है, करियर बनाना है।
लेकिन अगर पढ़ाई और नौकरी की जगहें ही मानसिक दबाव और डर की जगह बन जाएँ, तो हम अपने ही देश का भविष्य खो रहे हैं।

हर बार एक घटना होती है, हम दुख जताते हैं, कैंडल मार्च करते हैं, और फिर सब भूल जाते हैं।
लेकिन नाम बदलते रहते हैं —
कभी तन्वी, कभी अमन, कभी रोहित, कभी पायल…

सवाल यह है — अगला नाम आने से पहले क्या हम सिस्टम बदलने की बात करेंगे?

अगर आप स्टूडेंट हैं, डॉक्टर हैं, वकील हैं, कॉरपोरेट में काम करते हैं, मीडिया या मॉडलिंग लाइन में हैं — कमेंट में बताइए:

क्या आपने या आपके किसी जानने वाले ने ऐसा मानसिक दबाव या उत्पीड़न झेला है? और आपके हिसाब से इसका समाधान क्या हो सकता है?

अंत में एक अधिवक्ता के रूप में मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि हर उत्पीड़न का मामला पुलिस या कोर्ट तक नहीं पहुँचता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि समस्या नहीं है। बहुत से लोग चुपचाप सहते रहते हैं क्योंकि उन्हें अपना करियर बचाना होता है। लेकिन हमें इस विषय पर सामाजिक के साथ-साथ कानूनी स्तर पर भी बात करनी होगी, क्योंकि हमें यह समझना होगा कि मानसिक उत्पीड़न दिखाई नहीं देता, लेकिन कई बार इसका परिणाम शारीरिक उत्पीड़न से भी ज्यादा खतरनाक होता है।

नोट: यह लेख किसी एक व्यक्ति, कॉलेज, संस्था या इंडस्ट्री पर आरोप लगाने के लिए नहीं है। यह एक सामाजिक और संस्थागत समस्या पर चर्चा के उद्देश्य से लिखा गया है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।

 

Written by Advocate Ravi – Delhi Courts
Legal Awareness | Social Issues | Institutional Justice

Tags: Academic Pressure IndiaCareer pressure IndiaCrime in Delhi articleInstitutional HarassmentMedical College HarassmentMental Harassment at WorkplaceMental Harassment Law IndiaPayal Tadvi casePower imbalance workplaceRagging laws IndiaRohith Vemula caseStudent mental health IndiaStudent Rights IndiaStudent Suicide IndiaWorkplace Harassment India
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