Supreme Court Internet Access Fundamental Right 2026: सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि इंटरनेट तक पहुँच और उसका उपयोग करना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं। कोर्ट ने इस अधिकार को भारतीय संविधान के Article 21 और Article 19(1)(a) से जोड़ा। साथ ही, बच्चों को ऑनलाइन sexual exploitation और harmful content से बचाने के लिए social media platforms तथा संबंधित authorities की जिम्मेदारी पर जोर दिया।
यह आदेश Just Rights for Children Alliance & Anr. v. S. Harish & Ors., M.A. Nos. 2553–2554 of 2026 in Criminal Appeal Nos. 2161–2162 of 2024, 2026 INSC 1149, में पारित किया गया। मामले की सुनवाई Justice J.B. Pardiwala और Justice K. Vinod Chandran की Bench ने की।
इस आदेश का महत्वपूर्ण संदेश है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए केवल इंटरनेट या social media से दूर रखना ही समाधान नहीं है। Harmful content को रोकना, उसे फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना और platforms की जवाबदेही तय करना भी जरूरी है।
Supreme Court के सामने मामला क्या था?
यह मामला बच्चों के यौन शोषण और उनसे संबंधित आपत्तिजनक सामग्री के online circulation को रोकने के लिए पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों के प्रभावी implementation से जुड़ा था।
Supreme Court ने 23 सितंबर 2024 को इसी मामले में दिए गए अपने पहले के निर्णय में child sexual exploitation and abuse material (CSEAM) के प्रसार तथा social media intermediaries की कानूनी जिम्मेदारियों पर विचार किया था।
बाद में, कथित रूप से social media पर paid promotions और redirect links के माध्यम से ऐसी सामग्री तक पहुँच उपलब्ध कराने से संबंधित चिंताएँ सामने आईं। इसके बाद Court ने मौजूदा व्यवस्था में कमियों, reporting mechanisms और platforms द्वारा उठाए जाने वाले कदमों पर विस्तार से विचार किया।
Court के सामने मुख्य सवाल था: जब harmful content अलग-अलग websites और social media platforms के माध्यम से फैलता है, तो उसे जल्दी पहचानने, report करने और हटाने के लिए प्रभावी व्यवस्था कैसे बनाई जाए?
Video Link: Internet Access Ab Fundamental Right – Supreme Court ka Faisla
क्या Internet Access अब Fundamental Right है?
हाँ। इस आदेश में Supreme Court ने स्पष्ट रूप से कहा कि इंटरनेट तक पहुँच और उसका उपयोग करना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, जो Article 21 read with Article 19(1)(a) के अंतर्गत संरक्षित है।
Article 21 — Right to Life and Personal Liberty
Article 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण देता है। आधुनिक समय में शिक्षा, सरकारी सेवाओं, सूचना, डिजिटल सुविधाओं और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के लिए इंटरनेट की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।
इंटरनेट की उपलब्धता का अभाव व्यक्ति की शिक्षा, अवसरों और सामाजिक भागीदारी को प्रभावित कर सकता है। Court ने digital access को गरिमा, स्वतंत्रता और समान भागीदारी से जोड़कर देखा।
Article 19(1)(a) — Freedom of Speech and Expression
Article 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। इस स्वतंत्रता का संबंध केवल अपनी बात कहने से नहीं, बल्कि जानकारी प्राप्त करने और विचारों का आदान-प्रदान करने से भी है।
इंटरनेट लोगों को सूचना प्राप्त करने, विचार व्यक्त करने, शिक्षा लेने और अपनी रचनात्मकता साझा करने का माध्यम देता है। इसी व्यापक संदर्भ में Court ने इंटरनेट तक पहुँच के अधिकार को Article 19(1)(a) के साथ पढ़ा।
बच्चों को भी यह अधिकार है। Court ने स्पष्ट किया कि केवल कम उम्र होने के आधार पर बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह वंचित करना उचित समाधान नहीं है।
क्या अब बच्चों के Social Media Use पर कोई रोक नहीं लग सकती?
इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि बच्चों को हर प्रकार के online content या हर digital service तक बिना किसी safeguard के पहुँच मिल गई है।
Supreme Court ने बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों के बीच संतुलन पर जोर दिया। Court ने blanket restrictions को समाधान के रूप में स्वीकार नहीं किया, लेकिन बच्चों की उम्र और सुरक्षा को ध्यान में रखकर उचित, proportionate safeguards बनाने की संभावना को भी खारिज नहीं किया।
ऐसे safeguards में, उदाहरण के लिए, निम्नलिखित उपायों पर विचार किया जा सकता है:
- बच्चों के social media accounts के लिए suitable privacy settings।
- अनजान वयस्कों से unwanted contact और messages को सीमित करना।
- बच्चों की उम्र के अनुरूप content moderation।
- छोटे बच्चों के accounts के लिए parental consent और guidance की व्यवस्था।
- बच्चों को target करने वाले advertisements तथा harmful content पर प्रभावी नियंत्रण।
Court ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके विचारों से सरकार को inherently harmful categories या services—जैसे adult-content websites—तक बच्चों की पहुँच सीमित करने के लिए उचित कदम उठाने से नहीं रोका गया है।
इसलिए सही निष्कर्ष यह है कि बच्चों के इंटरनेट अधिकार और उनकी online safety को साथ-साथ सुरक्षित किया जाना चाहिए।
CSEAM क्या है और यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
CSEAM का पूरा नाम Child Sexual Exploitation and Abuse Material है। इसका अर्थ ऐसी सामग्री से है जो बच्चों के यौन शोषण या abuse से संबंधित हो।
ऐसी सामग्री का निर्माण, प्रसार, बिक्री या अवैध circulation बच्चों की गरिमा, सुरक्षा और अधिकारों को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है। इसके प्रसार को रोकने के लिए प्रभावी reporting, detection और removal mechanisms आवश्यक हैं।
Court ने इस बात पर चिंता जताई कि केवल किसी एक platform पर सामग्री हटाने से जरूरी नहीं कि वही सामग्री अन्य platforms या external websites पर भी हट जाए। इसी कारण cross-platform coordination और बेहतर technological safeguards पर जोर दिया गया।
यह मुद्दा केवल social media companies तक सीमित नहीं है। कानून के अनुसार, संदिग्ध सामग्री की जानकारी मिलने पर संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं पर भी परिस्थितियों के अनुसार reporting तथा अन्य कानूनी दायित्व लागू हो सकते हैं।
National Hash and URL List Database क्या है?
आदेश में Court ने CSEAM की पहचान और removal को अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक comprehensive national Hash and URL List Database की आवश्यकता पर विचार किया। इसे सरल भाषा में समझिए।
Hash Matching
Hash एक digital identifier होता है, जिसका इस्तेमाल किसी digital file या सामग्री की पहचान में किया जा सकता है। पहचान की गई अवैध सामग्री से जुड़े hash identifiers का उपयोग करके platforms समान सामग्री को दोबारा upload किए जाने पर पहचानने में मदद पा सकते हैं।
कुछ तकनीकी व्यवस्थाओं में perceptual hashing का उपयोग किया जाता है, जिससे सामग्री में कुछ बदलाव होने के बावजूद उसके समान होने की पहचान करने में सहायता मिल सकती है।
URL Listing
URL किसी website या online resource का web address होता है। यदि किसी अवैध सामग्री की पहचान किसी बाहरी website पर होती है, तो संबंधित URL को सूचीबद्ध करने से उस location तक पहुँचने या उस link के दोबारा प्रसार को रोकने में मदद मिल सकती है।
National Database का उद्देश्य
ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य संबंधित platforms के बीच coordination बढ़ाना और पहले से पहचानी गई harmful सामग्री को दोबारा फैलने से रोकना है।
हालाँकि, इस प्रकार की प्रणाली में गलत पहचान, privacy और legitimate content के अनुचित removal से बचने के लिए उचित verification, human oversight और grievance redressal safeguards भी महत्वपूर्ण हैं। Court ने इन safeguards पर भी विचार किया।
Social Media Platforms की कानूनी जिम्मेदारी क्या है?
Supreme Court ने स्पष्ट किया कि online platforms की जिम्मेदारी केवल अपनी policies प्रकाशित करने या users की शिकायतों पर निर्भर रहने तक सीमित नहीं हो सकती। लागू कानून के तहत आवश्यक due diligence, reporting और removal obligations का पालन भी महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में कुछ प्रमुख कानूनी प्रावधान हैं:
Information Technology Act, 2000 — Section 79: यह कुछ शर्तों और due diligence के अधीन intermediaries को third-party information के संबंध में safe-harbour protection प्रदान करता है। यह protection हर परिस्थिति में स्वतः उपलब्ध नहीं होती।
Information Technology Rules, 2021: ये rules intermediaries के लिए due diligence और grievance redressal से संबंधित दायित्व निर्धारित करते हैं। लागू संशोधनों और संबंधित नियमों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
POCSO Act, 2012 — Sections 19, 20 और 21: ये प्रावधान संबंधित परिस्थितियों में reporting और reporting में विफलता के परिणामों से जुड़े हैं। किसी विशेष मामले में कौन-सा दायित्व लागू होगा, यह तथ्य और कानून पर निर्भर करेगा।
POCSO Act — Section 15: यह बच्चों से संबंधित यौन सामग्री को संग्रहीत रखने के कुछ रूपों को दंडनीय बनाता है। इसके लागू होने के लिए संबंधित statutory ingredients और परिस्थितियों का परीक्षण आवश्यक है।
IT Act — Section 67B: यह बच्चों को यौन रूप से स्पष्ट कृत्यों में दर्शाने वाली सामग्री से संबंधित कुछ प्रकार के electronic publication, transmission और अन्य निर्दिष्ट आचरण को दंडनीय बनाता है।
Court ने reporting, grievance redressal, technological detection और लगातार non-compliance के परिणामों जैसे विषयों पर विस्तृत विचार किया। Platforms की liability का निर्धारण संबंधित statutory provisions और वास्तविक तथ्यों के आधार पर होगा।
क्या Court ने Platforms पर जुर्माने और कड़ी कार्रवाई की बात कही?
हाँ, आदेश में persistent non-compliance के लिए प्रभावी penalties और exemplary monetary fines की आवश्यकता पर विचार किया गया। Court ने यह भी कहा कि paywalled या subscription-based content के माध्यम से CSEAM के प्रसार को रोकने के लिए scrutiny और safeguards पर ध्यान देना जरूरी है।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए: आदेश में कुछ मुद्दों पर Union of India से guidelines, standard operating procedures और आवश्यक कानूनी कदमों पर विचार करने को कहा गया है। इसलिए हर प्रस्ताव या विचार को ऐसा नहीं समझना चाहिए कि सभी नए दंड तत्काल अपने-आप लागू हो गए हैं।
किसी platform के विरुद्ध कार्रवाई का प्रश्न लागू कानून, Court के operative directions, संबंधित नियमों और मामले के तथ्यों के अनुसार तय होगा।
आम लोगों और Parents के लिए इस आदेश का क्या मतलब है?
इस आदेश से कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं:
- Digital access महत्वपूर्ण है: इंटरनेट शिक्षा, सूचना और अभिव्यक्ति का माध्यम है।
- बच्चों को केवल प्रतिबंधित करना पर्याप्त नहीं: उन्हें सुरक्षित online environment देना भी जरूरी है।
- Parents की भूमिका बनी रहती है: उम्र के अनुरूप guidance, privacy settings और online safety की जानकारी बच्चों की सुरक्षा में मदद कर सकती है।
- Platforms की जवाबदेही महत्वपूर्ण है: लागू कानून के तहत harmful content की पहचान, reporting और removal में उनकी भूमिका है।
- Privacy और freedom of expression भी महत्वपूर्ण हैं: safeguards ऐसे होने चाहिए जो वास्तविक खतरे को रोकें, लेकिन वैध सामग्री और उपयोगकर्ताओं के अधिकारों पर अनावश्यक असर न डालें।
यदि किसी को online child exploitation या abuse से संबंधित सामग्री दिखाई देती है, तो उसे डाउनलोड, forward या अपने पास सुरक्षित रखने के बजाय संबंधित platform के reporting mechanism और उचित सरकारी/पुलिस प्राधिकरण को सूचित करना चाहिए। बच्चों की पहचान और privacy की रक्षा करना भी बेहद जरूरी है।
इस आदेश का संवैधानिक महत्व (Constitutional Importance)
यह आदेश डिजिटल युग में Fundamental Rights की बदलती भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
इंटरनेट अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। यह शिक्षा, सूचना, सरकारी सेवाओं, रोजगार के अवसरों और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी से जुड़ा है। इसलिए डिजिटल पहुँच से जुड़े सवालों का संबंध संवैधानिक अधिकारों से भी है।
दूसरी ओर, ऑनलाइन दुनिया में बच्चों के यौन शोषण और abuse से संबंधित सामग्री का प्रसार गंभीर समस्या है। इसका समाधान तकनीकी उपायों, कानूनी जवाबदेही, समय पर reporting, प्रभावी investigation और बच्चों की सुरक्षा के लिए जागरूकता के संयुक्त प्रयासों से ही संभव है।
Supreme Court का दृष्टिकोण यह रेखांकित करता है कि सुरक्षा और स्वतंत्रता को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय ऐसा framework विकसित करना चाहिए जो दोनों की रक्षा कर सके।
Internet Access एक अधिकार है, लेकिन Online Safety भी जरूरी है
Just Rights for Children Alliance v. S. Harish में 15 अक्टूबर 2026 का Supreme Court आदेश इंटरनेट तक पहुँच और उसके उपयोग को Article 21 read with Article 19(1)(a) के अंतर्गत मौलिक अधिकार के रूप में स्पष्ट करता है, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं।
साथ ही, यह आदेश बताता है कि बच्चों को online sexual exploitation से बचाने के लिए केवल इंटरनेट पर blanket restrictions लगाने के बजाय harmful content, उसके प्रसार में शामिल व्यक्तियों और कानून के अनुपालन में विफल रहने वाले intermediaries पर प्रभावी ध्यान देना जरूरी है।
आगे इस framework का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित authorities, social media platforms और अन्य stakeholders कानूनी दायित्वों को किस तरह लागू करते हैं।
Know Your Rights: इंटरनेट तक पहुँच एक महत्वपूर्ण अधिकार है। लेकिन डिजिटल दुनिया में अपने अधिकारों के साथ अपनी सुरक्षा और दूसरों की गरिमा का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है।
Case Details
- Case: Just Rights for Children Alliance & Anr. v. S. Harish & Ors.
- Citation: 2026 INSC 1149
- Case Number: M.A. Nos. 2553–2554 of 2026 in Criminal Appeal Nos. 2161–2162 of 2024
- Order Date: 15 October 2026
- Bench: Justice J.B. Pardiwala and Justice K. Vinod Chandran
- Primary Legal Provisions: Constitution of India, Articles 21 and 19(1)(a); Information Technology Act, 2000; POCSO Act, 2012; applicable IT Rules.
- Helpline Displays: Child Helpline (1098), Cyber Crime Helpline (1930), and the National Cyber Crime Reporting Portal details (with nodal officers) must be prominently displayed in every classroom, hostel, library, computer lab, and school website.
Read the Full order: Supreme Court order text.
Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह किसी विशेष मामले के लिए legal advice नहीं है। किसी विवाद या कानूनी कार्रवाई में संबंधित आदेश, लागू कानून और मामले के तथ्यों की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है।
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By Advocate Ms Ravi | CrimeInDelhi.com | Know Your Rights





