भारत में POCSO Act, 2012 बच्चों को sexual offences से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया एक बेहद महत्वपूर्ण कानून है। इस कानून का उद्देश्य बच्चों को sexual abuse, sexual harassment, exploitation और pornography जैसे गंभीर अपराधों से बचाना है। इसमें कोई संदेह नहीं कि POCSO भारत के सबसे महत्वपूर्ण child protection laws में से एक है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नई बहस तेजी से सामने आई है। सवाल यह है कि क्या आज का POCSO law exploitation और consensual adolescent relationships के बीच पर्याप्त अंतर कर पा रहा है?
यह बहस खासकर 16–18 age group को लेकर बढ़ रही है। आज social realities तेजी से बदल रही हैं। Teenage relationships पहले की तुलना में अधिक common हो चुके हैं। Schools, coaching institutes, colleges और social media interactions ने relationship dynamics को काफी बदल दिया है।
ऐसे में कई मामलों में देखा गया है कि 16–18 वर्ष के teenagers consensual relationships में होते हैं। लेकिन यदि परिवार इस relationship को स्वीकार नहीं करता, तो कई बार मामला सीधे criminal case में बदल जाता है। यहीं से असली debate शुरू होती है।
सबसे पहले समझिए: POCSO Act क्या कहता है?
POCSO का full form है Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012। इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र का हर व्यक्ति child माना जाता है।
यही इस law का सबसे महत्वपूर्ण point है। इसका सीधा अर्थ यह है कि 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति की consent कानून की नजर में valid consent नहीं मानी जाती। यानी अगर लड़की 17 वर्ष 11 महीने की भी है और relationship पूरी तरह consensual है, तब भी कानून consent को legally recognize नहीं करता। यहीं practical difficulty सामने आती है।
मान लीजिए एक case में लड़की 17 वर्ष 8 महीने की है और लड़का 19 वर्ष का है। दोनों relationship में हैं और अपनी इच्छा से साथ गए हैं। लेकिन परिवार relationship के खिलाफ है। ऐसी स्थिति में कई बार FIR दर्ज होती है—POCSO, Kidnapping और Rape जैसी गंभीर धाराओं में। देखते ही देखते एक consensual relationship serious criminal prosecution में बदल जाता है।
कई मामलों में young boys arrest होते हैं, judicial custody में जाते हैं, उनकी studies और career प्रभावित होती है, और social stigma अलग झेलना पड़ता है। बाद में trial के दौरान victim relationship को consensual भी बता दे, तब भी accused को लंबी legal process face करनी पड़ सकती है।
यही इस debate का सबसे sensitive हिस्सा है।
Courts ने क्या कहा?
पिछले कुछ वर्षों में Courts ने भी इस issue पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कई judicial observations में यह सामने आया है कि बड़ी संख्या में POCSO cases वास्तव में consensual adolescent relationships से जुड़े होते हैं।
हाल ही में Sonu Halder v. State (NCT of Delhi), 2026 में Delhi High Court ने bail grant करते हुए महत्वपूर्ण observation दी। Court ने कहा कि POCSO Act का उद्देश्य minors को sexual exploitation और abuse से protect करना है, न कि young individuals के consensual romantic relationships को criminalise करना।
Court ने यह भी माना कि भले ही minor की consent कानून की नजर में valid न हो, लेकिन bail stage पर surrounding circumstances, age proximity और relationship nature जैसे factors relevant हो सकते हैं।
इसी तरह Madras High Court ने भी कई मामलों में माना है कि adolescent romantic relationships को हर बार कठोर criminal prosecution के lens से देखना practical difficulties पैदा करता है। Court ने यह भी स्वीकार किया कि changing social realities को पूरी तरह ignore नहीं किया जा सकता।
Sabari v. Inspector of Police (2019) जैसे मामलों में Court ने adolescent romantic relationships और sexual exploitation के बीच distinction की आवश्यकता पर जोर दिया।
Supreme Court ने भी हाल के वर्षों में 16–18 age group और consensual relationships को लेकर concern व्यक्त किया है और इस sensitive issue पर policy-level reform discussion की आवश्यकता की ओर संकेत किया है।
असली सवाल: Protection बनाम Criminalisation?
यही इस debate का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बच्चों को sexual abuse और exploitation से बचाने के लिए मजबूत कानून जरूरी हैं। POCSO Act ने child protection framework को काफी मजबूत किया है।
लेकिन दूसरी तरफ ground reality यह भी दिखाती है कि कई मामलों में consensual adolescent relationships भी गंभीर criminal prosecution में बदल जाते हैं। यहीं सबसे बड़ा legal question खड़ा होता है—क्या वर्तमान law exploitation और consensual adolescent relationships के बीच पर्याप्त distinction कर पा रहा है?
यही debate आज courts, legal experts और policy makers के बीच चल रही है।
क्या Romeo-Juliet Clause भारत में लागू होना चाहिए?
इसी debate के बीच एक concept अक्सर सामने आता है—Romeo-Juliet Clause।
कई देशों में यह legal provision मौजूद है, जिसका उद्देश्य consensual adolescent relationships को limited protection देना है। खासकर उन मामलों में जहां दोनों individuals age-wise एक-दूसरे के करीब हों, relationship consensual हो और exploitation, force या coercion का कोई element मौजूद न हो।
उदाहरण के लिए, यदि एक लड़की 17 वर्ष की है और लड़का 19 वर्ष का है, और दोनों अपनी इच्छा से relationship में हैं, तो ऐसे मामलों को हर बार कठोर criminal prosecution के तहत लाना क्या उचित है—यही सवाल Romeo-Juliet Clause के केंद्र में है।
इस concept का उद्देश्य child protection को कमजोर करना नहीं है, बल्कि genuine abuse cases और consensual adolescent relationships के बीच बेहतर distinction बनाना है।
भारत में फिलहाल ऐसा कोई specific clause मौजूद नहीं है। लेकिन legal circles में समय-समय पर यह चर्चा होती रही है कि क्या 16–18 age group के मामलों के लिए कोई nuanced legal framework होना चाहिए।
क्या कानून में बदलाव की जरूरत है?
यही इस पूरी debate का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे संवेदनशील प्रश्न है।
एक तरफ यह स्पष्ट है कि बच्चों को sexual abuse और exploitation से बचाने के लिए strict law जरूरी है। POCSO Act ने child protection framework को काफी मजबूत किया है और इसमें कोई संदेह नहीं कि यह कानून लाखों बच्चों की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
लेकिन दूसरी तरफ practical reality यह भी है कि बदलती social realities ने नए legal challenges पैदा किए हैं। आज 16–18 age group के बीच relationships पहले की तुलना में अधिक common हो चुके हैं। ऐसे में हर case को एक ही lens से देखना कई बार complex situations पैदा कर सकता है।
यही कारण है कि कई legal experts, courts और policy makers यह मानते हैं कि इस sensitive area में serious discussion की आवश्यकता है।
बहस यह नहीं है कि POCSO कमजोर होना चाहिए। असल बहस यह है कि क्या law को इतना balanced बनाया जा सकता है कि child protection भी मजबूत रहे और consensual adolescent relationships के मामलों में unnecessary criminalisation से भी बचा जा सके।
POCSO Act भारत के सबसे महत्वपूर्ण child protection laws में से एक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बच्चों को sexual abuse और exploitation से बचाने के लिए strict legal framework जरूरी है।
लेकिन यह भी सच है कि changing social realities ने नए legal challenges पैदा किए हैं। 16–18 age group, adolescent autonomy, consent और child protection के बीच सही balance बनाना आने वाले वर्षों में Indian legal system के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक हो सकता है।
आज जरूरत केवल कानून को strict बनाने की नहीं, बल्कि उसे practical realities के अनुसार balanced और effective बनाए रखने की भी है। शायद अब समय आ गया है कि इस विषय पर एक गंभीर राष्ट्रीय कानूनी चर्चा हो।
About the Author: Adv. Ms Ravi दिल्ली में practicing Advocate और Legal Consultant हैं। उनका अनुभव criminal litigation, POCSO matters, matrimonial disputes, civil litigation, legal drafting और legal research जैसे क्षेत्रों में है।
अपने लेखों और legal analysis के माध्यम से वह complex legal issues को आसान और practical language में आम लोगों तक पहुंचाने का प्रयास करती हैं। वह नियमित रूप से criminal law, legal awareness, public interest issues और emerging legal challenges पर लिखती हैं।
उनका उद्देश्य लोगों को उनके legal rights, remedies और Indian legal system की practical understanding प्रदान करना है।
Disclaimer: यह लेख केवल legal awareness, educational discussion और informational purposes के लिए प्रकाशित किया गया है। इस लेख में व्यक्त विचार child protection laws, legal policy और changing social realities पर informed discussion को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हैं। यह लेख किसी भी प्रकार से बच्चों के विरुद्ध अपराध, unlawful conduct या किसी illegal activity को support, justify या promote नहीं करता। इस लेख में दी गई जानकारी को legal advice या legal opinion न माना जाए। Case-specific guidance के लिए किसी qualified advocate से सलाह अवश्य लें।





