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Passive Euthanasia पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कब हटाया जा सकता है लाइफ सपोर्ट?

आसान भाषा में समझें

Ravi Tondak by Ravi Tondak
March 11, 2026
in Court & Judgements, Crime News
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Supreme Court decision on passive euthanasia in India
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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। यह फैसला गंभीर रूप से बीमार मरीजों से जुड़ा है।

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कोर्ट ने कहा कि कुछ परिस्थितियों में मरीज का लाइफ सपोर्ट हटाया जा सकता है। हालांकि ऐसा निर्णय केवल सख्त कानूनी प्रक्रिया के बाद ही संभव है।

इस फैसले ने भारत में पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) और “गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार” पर फिर से चर्चा शुरू कर दी है।

क्या था मामला

मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था जो कई वर्षों से वेजिटेटिव स्टेट में था। इस स्थिति में मरीज जीवित तो होता है, लेकिन उसे आसपास की कोई समझ नहीं होती।

डॉक्टरों के अनुसार मरीज के ठीक होने की संभावना बहुत कम थी। इसलिए परिवार ने अदालत से लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति मांगी। इसके बाद कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय का अध्ययन किया। अंत में अदालत ने लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दे दी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है। इसी तरह कुछ परिस्थितियों में गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी महत्वपूर्ण है।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए।

सबसे पहले डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम मरीज की स्थिति की जांच करेगी। इसके बाद तय किया जाएगा कि लाइफ सपोर्ट जारी रखना जरूरी है या नहीं।

पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) क्या है

पैसिव यूथेनेशिया का मतलब है मरीज से कृत्रिम जीवन रक्षक उपचार हटाना। यह तब किया जाता है जब मरीज के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं होती।

उदाहरण के लिए:

  • वेंटिलेटर हटाना

  • कृत्रिम फीडिंग रोकना

  • अन्य लाइफ सपोर्ट मशीनें बंद करना

हालांकि यह समझना जरूरी है कि भारत में एक्टिव यूथेनेशिया अभी भी अवैध है। एक्टिव यूथेनेशिया का मतलब है किसी को इंजेक्शन देकर जानबूझकर मृत्यु देना।

भारत में यूथेनेशिया से जुड़े कानून

भारत में यूथेनेशिया से जुड़े नियम मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से बने हैं।

अरुणा शानबाग केस (2011)

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार सीमित परिस्थितियों में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। साथ ही कुछ दिशा-निर्देश भी जारी किए गए।

कॉमन कॉज केस (2018)

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा है।

इसके अलावा कोर्ट ने लिविंग विल को भी मान्यता दी। लिविंग विल का मतलब है कि व्यक्ति पहले से लिख सकता है कि गंभीर स्थिति में उसे किस प्रकार का इलाज दिया जाए।

यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला कई कारणों से महत्वपूर्ण है।

सबसे पहले, इससे गंभीर मरीजों के मामलों में कानूनी स्पष्टता मिलेगी। इसके अलावा डॉक्टरों और अस्पतालों को भी सही प्रक्रिया समझने में मदद मिलेगी। वहीं दूसरी ओर, यह फैसला मरीज की गरिमा और अधिकारों की रक्षा को भी मजबूत करता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में चिकित्सा और कानून के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। यह निर्णय बताता है कि कानून केवल जीवन बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव गरिमा और संवेदनशीलता को भी महत्व देता है।

हालांकि ऐसे मामलों में हर निर्णय सावधानी से लिया जाता है। इसलिए डॉक्टरों की राय और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होता है।

(FAQ)

Q1: Passive Euthanasia क्या है?

Passive Euthanasia का मतलब है ऐसे मरीज से जीवन रक्षक चिकित्सा या मशीनों को हटाना, जिसकी हालत गंभीर हो और जिसके ठीक होने की संभावना बहुत कम हो। इसमें वेंटिलेटर या अन्य लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाए जा सकते हैं।

Q2: क्या भारत में लाइफ सपोर्ट हटाना कानूनी है?

हाँ, कुछ परिस्थितियों में यह कानूनी हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार डॉक्टरों की विशेषज्ञ राय और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बाद लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी जा सकती है।

Q3: क्या एक्टिव यूथेनेशिया भारत में अवैध है?

हाँ। भारत में एक्टिव यूथेनेशिया अवैध है। इसका मतलब है किसी व्यक्ति को इंजेक्शन या दवा देकर जानबूझकर मृत्यु देना कानूनन अपराध माना जाता है।

Q4: वेजिटेटिव स्टेट क्या होता है?

वेजिटेटिव स्टेट एक ऐसी चिकित्सीय स्थिति है जिसमें मरीज जीवित होता है, लेकिन उसे आसपास की चीजों की कोई समझ नहीं होती। आमतौर पर यह स्थिति गंभीर मस्तिष्क चोट या लंबे समय तक ऑक्सीजन की कमी के कारण होती है।

Q5: क्या परिवार लाइफ सपोर्ट हटाने का फैसला ले सकता है?

कुछ मामलों में परिवार अदालत की अनुमति के लिए आवेदन कर सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय आमतौर पर डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर लिया जाता है।

Q6: “Right to Die with Dignity” क्या है?

“Right to Die with Dignity” का मतलब है कि व्यक्ति को ऐसी स्थिति में जब वह असाध्य बीमारी से पीड़ित हो और ठीक होने की संभावना न हो, गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 से जोड़ा है।

Q7: लिविंग विल क्या होती है?

लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज है। इसमें व्यक्ति पहले से लिख सकता है कि अगर वह भविष्य में गंभीर हालत में हो जाए, तो उसे किस प्रकार का इलाज दिया जाए या न दिया जाए।

Q8: पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति कब दी जाती है?

पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति आमतौर पर तब दी जाती है जब मरीज लंबे समय से असाध्य स्थिति में हो और मेडिकल विशेषज्ञ यह मानें कि उसके ठीक होने की संभावना नहीं है।

CrimeInDelhi.com – क्राइम न्यूज़, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और कानून से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी के लिए CrimeInDelhi.com से जुड़े रहें।

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Ravi Tondak

Ravi Tondak

I am an Advocate and Legal Consultant with expertise in criminal law, matrimonial disputes, and contract matters. On crimeindelhi.com, I write to explain legal developments, court judgments, and rights in a clear and easy-to-understand way. I also provide professional legal help and consultancy, guiding individuals through complex legal issues and offering practical solutions to protect their interests. Contact me for legal help and consultant.

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